Thursday, December 24, 2009

हैप्पी क्रिसमस ....



यूँ तो त्यौहार किसी विशेष उम्र से जुड़ा नहीं है .... पर बच्चों में इसके प्रति कितना लगाव है ये तो संता क्लाज़ की बढती लोकप्रियता से पता चलता है ... वैसे तो सारा जादू तो बाज़ार का चलाया हुआ है पर उसकी एक अच्छी बात यह है कि कोई भी फेस्टिवल किसी विशेष धर्म का होकर सभी का हो गया है .... बच्चे छोटे थे तो क्रिसमस स्पेशल सॉक्स दीवार पर लटकाया करते थे जिसका मतलब था संता क्लाज़ से प्रार्थना , गिफ्ट के लिए ...और सुबह को मिला करते थे गिफ्ट , उनके तकिये के नीचे ....बस बच्चों की ख़ुशी में हमारी ख़ुशी ....
कितना मासूम होता है बचपन .... ...और कितना शैतान भी....मगर जितना शैतान उतना दिल के करीब ....




वो बचपन नादान आवारा था ,
मगर फिर भी कितना प्यारा था....
धूप बातें करती थी
कमीज की बाँहें मोड़ कर ,
परछाईयां लम्बी होती जाती थी
शामों का हाथ पकड़कर ,
शैतान गलियों संग
फिरता मारा मारा था ,
वो बचपन नादान आवारा था .....
मीठी सुबहें चखते थे तो ,
दोपहर नमकीन हो जाती थी ,
माँ की आवाज में छोटी बहन तुतलाती थी ,
मार खा कर भी
पिता की आंखों का तारा था ,
वो बचपन नादान आवारा था ....
छूकर हमको छुप जाती थी ,
ऐसी खिलनदड हवाएं थी ,
आंखों पर पट्टी बाँध कर
ढूंढती हमें दिशाएँ थी ,
शहंशाह थे हम अपने दिल के
ताज हमारा , तख़्त हमारा था ,
वो बचपन नादान आवारा था...
होली दिवाली ईद क्रिसमस
सब पर गले मिलते थे ,
गोल गोल फिरकी बनकर
आँगन में नाचा करते थे ,
जेठ, शिशिर, माघ औ फागुन
हर मौसम हमको प्यारा था ,
वो बचपन नादान आवारा था.....



Sunday, December 6, 2009

एक नगमा गाने को जी करता है


ऐ रात उतर आ आखों में
सपने देखने को जी करता है ...
फूल , बाग़ और खुशबू बहुत देखी
समंदर , झील और नदिया भी देखी
रूप बदलते इंसान भी देखे
गले मिलते जमीन और आसमान भी देखे
तारों की डोली से उतरते चाँद देखे
ज़री वाले घर आँगन भी देखे
ढेर सी बातें करने को जी करता है ...
ऐ रात उतर आ आंखों में
सपने देखने को जी करता है ....
खिलखिला कर हंस देंगी खिड़कियाँ
दिल के दर खोल देंगी खिड़कियाँ
सीढियां टाप कर घर आ जाना
मेरे गालों पर फिसल जाना
पाकीजा हैं मेरी खूशबूयें
रंग भरती हैं कूचियाँ
फ़िर कसमे खाने को जी करता है ...
ऐ रात उतर आ आंखों में
सपने देखने को जी करता है ....
सरगोशियों से काम न चलेगा
तस्वीर से निकल कर आ जाना
चाँद की बरात सजी है
तुम भी सज संवर जाना
तारों से मांग भर लेना
अपना आँचल लहरा देना
प्यारा सा गीत गाने को जी करता है ....
ऐ रात उतर आ आंखों में
सपने देखने को जी करता है ....

Monday, November 23, 2009

परदेस

गली में क्रिकेट खेलते लड़कों की खरखराती तीखी सी आवाज ....पता चलता है लड़के जवान हो रहे हैं आउट .......जब कोई लड़का आउट हुआ तो सारे चिल्लाये ....बस बेटिंग करने वाला बच्चा उर्फ़ लड़का ....नहीं , नहीं ...मेरे बैट से तो बॉल टच ही नहीं हुयी ...फ़िर मै आउट कैसे ?
पर सारे लड़कों ने मिलकर उसे आउट कर दिया ... भुनभुनाता हुआ पहुँचा मम्मी के पास ...
मुंह फुलाकर बैठा है ... ओफ्फ्फो ...इस लड़के का क्या करूँ रोज लड़कर आता हैं ...
आज क्या हुआ ....?
( चुप्पी)
चलो हाथ मुंह धो लो कुछ खाने को देती हूँ
कल सामने वाले भटनागर साब के यहाँ बॉल चली गई थी तब भी सहायता के लिए पुकार ....मझधार में बेडा पार कराने वाली मैया ...
मैया मोरी मै नहीं छक्का लगाओ ...न जाने कैसे बॉल अंकल के आँगन गिरी ...
उन्होंने बॉल छुपाओ ...
मैया मोरी ...
फ़िर से माँ ...
बसंत पंचमी आती ...पतंगों का मौसम , स्कूल से बंक, सुबह से पतंगों की पिटारी , चरखी और मंझा ...
चलो आसमान छु आयें ....
वो काटा .... उधर पतंग कटी , इधर मंझे से ऊँगली ....फ़िर याद आई मम्मी ...

अब बेटा विदेश चला गया हैं अब माँ को बेटे की याद आती हैं ... बेटा ,..... तेरी चरखी , तेरा मांझा , तेरी गेंदें ...सब मैंने संभाल कर राखी हैं ....
तू कब आएगा बेटा ....

Wednesday, November 4, 2009








सुलग
रहा है दिल उठ रहा है धुआं
दरवाजा खोल दे या आग बुझा दे यारां
मुफलिसी के दोरों से गुजरता चला गया
सोना , पाना अच्छा न था और खोना बुरा यारां
सच्चे दिल की दुआ कुबूल होती है
सजदे में सर झुके या हाथ उठें यारां
चौखट का दिया हूँ रौशनी कर ही जाऊंगा
चाँद लम्हों की मोहलत तो दे मुझे यारां
मुरीद हूँ आसमान का मै भी चाँद की तरह
कि झील में गिरकर भी बुझता नही यारां
सर उठा कर लहरों ने मदद को पुकारा था
किनारे पर आकर दम तोड़ गयीं यारां

Tuesday, October 20, 2009


आप सभी को दीपावली की शुभकामनाएं ...पूरे साल ये दीप यूँ ही जगमगायें ... आप सब राम और रावणकी इस घुमक्कडी का मज़ा लें ...फ़िर आयेंगे ब्लॉग पर एक नई पोस्ट के साथ... रावण- प्रभु , आज आपने यह अति उत्तम किया जो मुझे भी अपने साथ प्रथ्वी भ्रमण पर ले आए ... आज तो वसुंधरा अत्यधिक जगमगा रही है ....प्रतीत होता है की किसी उत्सव का आयोजन किया जा रहा है ... भ्रमण पर निकले तो देख भी लिया , वरना मै तो प्रत्येक दिवस की भांति स्वर्ग अप्सराओं के नृत्य गान और मदिरा पान में ही रत रहता
राम - तभी तो कहता हूँ रावण , थोड़ा भ्रमण भी किया करो ...सिंहासन पर बैठे बेठे , देखा नही तुम्हारा उदर ... वैसे भी तुम दस मुंह से भोजन करते हो , दशानन
रावण - ये क्या प्रभु ! नारद, ब्रम्हा यहाँ तक की स्वयं प्रभु महादेव भी अब तक मेरे उदर को देखकर व्यंग्य करते थे अब आपने भी मेरे साथ हास्य प्रारम्भ कर दिया ...अब मै कदापि आपके साथ भ्रमण को नही जाऊँगा
राम - नही नही , प्रिय रावण .... मै तो बस यूँ ही ...थोड़ा विनोद कर रहा था ...हाँ , तो तुमने प्रश्न किया था की प्रथविवासी किस उत्सव का आयोजन कर रहे हैं ....तो हे लंका पति , ये सब मेरे हेतु ही प्रायोजित है ...मेरे राज्याभिषेक की जयंती मनाकर ये लोग अपने कार्यालयों , एवं निवासों को दीपो से , आई मीन , चाइनीज झालरों से सजाते हैं ....
रावन - क्या ! आपके राज्य भिषेक की जयंती ....मेरे राज्याभिषेक पर तो कभी प्रजा ने ऐसा उत्सव नही मनाया ...
राम - क्या तुम्हे मेरे प्रति इर्ष्या की भावना उत्पन्न हो रही है
रावण - नहीं , इर्ष्या तो कदापि नही , परन्तु ....
राम - परन्तु क्या लंकेश ! मैंने तो तुम्हे सीता अपहरण के पहले ही आगाह किया था , पर , तुम तो फ़िर तुम हो .....
रावण - यह तो सत्य है प्रभु , परन्तु कल ही मैंने समाचार पत्र में एक स्त्री के अपहरण और बलात्कार का समाचार पढ़ा था और कल क्या ! ऐसी घटनाओं का विवरण में आए दिन प्रथ्वी लोक के समाचार पत्र में पढता ही रहता हूँ ...प्रथ्वी पर तो मनुष्य दैनिक न जाने कितने अपहरण करता है फ़िर उन्हें म्रत्यु दंड भी देता है ...मैंने तो मात्र एक अपहरण ही किया था , जानकी का , और उनकी इच्छा विरूद्व उनका स्पर्श भी नही किया था ....तदापि मैंने यह कुकृत्य आपसे , अपनी बहन सूर्पनखा का प्रतिशोध लेने के लिए किया था
राम - ( हँसते हुए ) जैसा भाई वैसी बहन ...एक करेला तो दूजा नीम चढा ...
रावण - क्या कुछ कहा आपने ?
राम - नहीं नहीं , कुछ भी तो नहीं , तुम आगे कहो ..क्या कह रहे थे ...?
रावण - जाने दीजिये , यह बताइए , की यहाँ , इस बड़ी सी इमारत में प्रकाश की चकाचौध और इसके सामने , वहाँ , कुटी जैसे दिखने वाले घर में अन्धकार ...ऐसा क्यूँ ? क्या आपके राज्य में भी ऐसा ही होता था ...? परन्तु मैंने स्वर्ग में तो ऐसा नही देखा ...
राम - यह मेरी नहीं , लक्ष्मी जी की माया है ...कहीं प्रकाश तो कहीं अन्धकार छाया है ...
रावण - तो अब ये प्रथ्वी वासी अब और क्या प्रायोजन करेंगे ...?
राम - करेंगे क्या.... तुम्हारा पुतला तो पहले ही दशहरे पर जला चुके हैं ....अब बस मेरे अयोध्या आगमन की खुशी में मिष्ठान वितरित करेंगे और रात्री को लक्ष्मी पूजन का आयोजन करेंगे
रावण - क्या प्रभु ...? मेरा पुतला जलाया ...मगर क्यूँ ...?
राम - क्यूंकि तुमने मर्यादायों का उलंघन किया , अतः तुम अधर्म के प्रतीक हुए अंततः तुम्हारी प्रतिमूर्ति बनाकर उस अधर्म का नाश करने हेतु उसे अग्नि में भस्म कर दिया
रावण - परन्तु मुझसे ज्यादा अधर्मी तो ये लोग हैं में तो महादेव जी के वरदान और अमृत कुंद प्राप्त करने से अभिमानी हो गया था
राम - उसी अभिमान का परिणाम तुम्हे भुगतना पड़ा
रावण - ( सोच में ) .....
राम - क्या सोच रहे हो ?
रावन - सोच रहा हूँ प्रभु , मेरे एक अभिमान का मुझे भयंकर परिणाम भुगतना पड़ा , फ़िर इन प्रथ्विवासियों के पास तो कोई वरदान या अमृत भी नहीं है , फ़िर इन्हे किस बात का अभिमान है ...?
राम - अभिमान है इन्हे अपनी बुद्धिमता का ...मनुष्य सोचता है कीइसका प्रयोग कर वह कुछ भी प्राप्त कर सकता है और रात दिन इसी उधेड़बुन में लगा रहता है यही नहीं , अपितु इनमे लोभ और परस्पर इर्ष्या भी निवास करती है ये नहीं जानते , जो ये कर रहे हैं , इसके कितने भयंकर परिणाम म्रत्युप्रांत भुगतने होंगे और म्रत्युप्रांत ही क्यूँ , इस जीवन में , इस लोक में भी ....
रावण - प्रभु , आपके दरबार में न्याय ही न्याय है आपकी जय हो
राम - वो देखो लंकेश ! चलते चलते तुम्हारी लंका आ गई
रावण - कहाँ प्रभु ! आह ...मेरी लंका ...मेरी प्यारी लंका ....
राम - जानते हो , आज भी लंका निवासी तुम्हारी पूजा करते है , यहाँ तुम्हारी प्रतिमूर्ति जलाई नही जाती , वरन पूजा होती है
रावण - ऐसा क्यूँ प्रभु !
राम - क्यूंकि तुम उस समय ज्ञानी राजा एवं महादेव के परम भक्त थे
रावण - नामामिमिशान निर्वान्रूपम
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं
निजाम निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाश्वासम भाजेयम
निराकार ओमकार मुलं तुरीयं
गिराज्ञान गोतित्मीषम गिरीशं
करालं महाकालं कृपालं
गुनागार संसारपारं नातोहम
अहोभाग्य प्रभु , आज आपके साथ भ्रमण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ....बस चलते चलते एक समस्या का समाधान और कर दीजिये
राम - कैसी समस्या रावण ? कहो ....
रावण - यह जो पाठक हमारे वार्तालाप को पढ़ रहा है , उसके ह्रदय में एक पीड़ा रह रह कर उठ रही है
राम - कैसी पीड़ा दशानन ...?
रावण - यही की में पापी होने हे उपरांत भी स्वर्ग में कैसे ? आपने भी मुझे की एपवाली दीपावली की बस आप इस पाठक की समस्या का समाधान कर दीजिये
राम - हा..हा ...लें ... इस पाठक में अत्यधिक बुद्धि का समावेश है रावन ...इसे स्वयं ही सोचने दो ....मनुष्य के आगे सारे भेद खोलना उचित नहीं ...चलो हम प्रस्थान करें ...
रावण - चलिए प्रभु ....जैसा आप उचित समझें ....

Saturday, October 10, 2009

दीवाली



जाने क्यूँ लगा है मुझे
कि आज दीवाली है ...
फ़िर कोई राम यहाँ
शायद आने वाला है ...
जिसके लिए घर आँगन
अपनी अट्टालिकाओं पर
दीपमालाएं सजाकर
चहक उठे हैं ...
जिनकी राहों में
बिछे हैं फूल सुगंध ...
लोगों की आस भरी
पलकें बिछी हैं ...
ढह जाएँगी मगर
उमीदों की दीवारें तब ...
फ़िर भेष बदलकर
रावन खड़ा होगा जब ....

Monday, September 28, 2009

उस पार

सुनसान है जीवन की धारा
कौन लगाएगा किनारा
साँसों का उधार थी जिन्दगी
कब हमारी अपनी थी जिन्दगी
साँसों ने अवकाश लिया
उस पार जब किसी ने पुकारा
आमानत गिरवी थी पास मेरे
उसने वापस छुडा लिया
साँसों के दम पर मैंने
घरोंदा बनाया मिटटी का
घरोंदे से प्यार कर बैठे
साँसों को बिसरा दिया
खुशबूओं से सजा कर
मग्न रहती थी जिन्दगी
हर पल उम्मीद जगा कर
पल पल पग रखती जिन्दगी
हाथों की लकीरों में
किस्मत अधूरी मिली थी
दिल की धडकनों में
साँसें अधूरी मिली थी
तुम्हारे पास आते हैं
अब पूर्ण कर देना
क्षितिज दूर है मगर
मिलाप कर देना ....

Friday, September 18, 2009











जब तुमने छुआ था
होठों पे वो अहसास बाकी है

आंखों में तुम्हारी मुहब्बत का
नशा अभी बाकी है
ये सफर तनहा तय होता नहीं
रास्ता अभी बाकी है
ख्वाब में देखी थी जो
वो मुलाक़ात अभी बाकी है
जिस चांदनी में नहाये थे कभी
वो खुशबू अभी बाकी है
तुम्हारे आने से बिखरे थे जो
फिजाओं में वो रंग बाकी है
दिल पर तुम्हारी नज़रों का
जादू अभी बाकी है

Saturday, September 5, 2009

कुछ यूँ ही बैठे बैठे ....


वैसे तो भादों की पूर्णिमा के चाँद की सुन्दरता का ख़ास महत्त्व तो नहीं है फ़िर भी शायद पहली बार इस पूर्णिमा के चाँद को देखकर सुकून सा मिल रहा है ...सांवले आसमान में वो अकेला चाँद और उसके नीचे मैले से बादल की एक रेखा जो उसकी चांदनी से चमक रही है ...मानों किसी कविता की ख़ास पंक्तियों को अंडर लाइन कर दिया हो ....और इस गोल गोल चाँद से कुछ दूर पूरे आसमान में चमकता हुआ इकलौता तारा ....मेरी आंखों को क्यूँ खटक रहा है ...जलन हो रही है मुझे इससे ...ज्वार भाटा सा उठ रहा है ...वो उस चाँद के पास आने को बेताब नज़र आ रहा है ....जिस दिशा में चाँद में चाँद चलता जाता है वो सितारा भी उसके आकर्षण में बंधा साथ साथ चल रहा है ...कुछ कुछ उसे डर है चाँद को खोने का ...आकर्षण में तो मै भी बंध रही हूँ पर साथ साथ नहीं चल सकती हूँ ...और ये लो ...बादल की मैली सी पंक्तियाँ और उभर आयीं हैं और चाँद को अपनी कैद में ले रही हैं ...नहीं तुम ऐसा नहीं कर सकते ...क्या कुसूर है उस बेचारे का ...खोल दो ये हथकडियां ...और बंधन से मुक्त कर दो ...दिन भर की आग में तपे, जले , जाने कितने दिलों को ठंडक दे रहा होगा ...तुम्हे देखकर तो धरती की तृष्णा जाग्रत हो जाती है पर ये जो चाँद है न ...इसकी खुशबू दिलों को महका देती है ....तभी तो ये कितने ही कवियों की कल्पना का आधार बनता रहा है ....


तारों की भीड़ में

अमावास की पीर है जिन्दगी

मेरा चाँद आज फ़िर मुझसे रूठा है ...

ख्वाब सज़ा लेते पलकों पे

जिन्दगी रखती हाथों पे

अगर तुम मेरे साथ होते ...

Thursday, August 20, 2009

मौन


शब्द भीग गए हैं
भीग कर कुम्हला जायेंगे
फ़िर मुडे तुडे नोट की भांति
बाज़ार में चल नहीं पाएंगे
गले सडे शब्दों से तो
मौन ही अच्छा है
गूंजता है वीरानियों में
कहता है कुछ कानों में
रोम रोम में बस जाता है
व्याकुल आकुल मन को
रहत सामग्री दे जाता है
इन भीगे शब्दों से
सडांध सी आती है
फ़िर इन्हे कोई
सुन भी नहीं पायेगा
नाक कान रुमाल से ढांप कर
आगे बढ़ जाएगा
ये शब्द
कीचड में खिलने वाले
कमल नही
जो देवता पर चढ़ जायें
या स्वागत द्वार पर
तोरण बन सज जायें
भस्म कर दो इन शब्दों को
मौन की भाषा सच्ची है
हवन हो जायेंगे शब्द
समिधा में मिलकर
सुवासित होगा मौन
शून्य में धुंआ बनकर ....

Friday, August 14, 2009

फ़िर मुरली की तान सुना दो ....


लो , सांवरे का जन्मदिवस फ़िर आ गया ...नगर में , मंदिरों में फ़िर धूम होगी , झांकियां सजी होंगी , रौशनी की गूँज होगी , कृष्ण की मुरलिया होगी , और होंगी सबकी प्यारी , बानी ठानी , चंदन सुवासित , कान्हा के ह्रदय सिंहासन पर राज करने वाली , ब्रज कुमारी , अलबेली राधा रानी ....
देवकी नंदन के जन्म से पहले ही सारी मथुरा नगरी को ज्ञात हो गया था की अत्याचारी राजा कंस के आतंक से मुक्ति दिलाने वाला उनका तारनहार अब जन्म लेने ही वाला है ...मथुरा की प्रजा को प्रतीक्षा थी उस पल के आगमन की ....और प्रजा ही क्यों ...यमुना के किनारे रहने वाले ऋषि -मुनि , पशु पक्षी , अपने प्रवाह में मग्न यमुना , पृथ्वी गगन , मस्त चल में दिशारत पवन , वह मयूर जो अपना सौंदर्य उन पर न्यौछावर करने को आतुर , और वो मुरली जिसे सबका प्यारा ग्वाला अपने मधुर अधरों का स्पर्श देने वाला था ....

यमुना की तो खुशी का ठिकाना ही न था ....उमड़ उमड़ , उठ गिर लहरों से अपनी खुशी का प्रदर्शन कर रही थी ...प्रेम रस में भीगा हुआ अमृत सा यमुना जल बढ बढ़ कर कृष्ण को अपनी और आकर्षित करने का प्रयास कर रहा था ...उनके चरणों के एक स्पर्श को आतुर हर धारा अपने निर्दिष्ट की और जाना ही नहीं चाहती थी ....देवकीनंदन के मधुर रूप के दर्शन से तृप्त हुए बिना कैसे मथुरा को छोड़ कर जांए और ऊपर से ये सांवरे मेघ .... स्वयं को कान्हा के रंग में रंगे घुमड़ घुमड़ कर अपने प्रेम का प्रदर्शन करते , सारी मथुरा नगरी में प्रेम जल की रसधार बरसते ॥रात्री की कालिमा को और भी गहराते ..विभिन्न आकृतियों में रूप बदल बदल कर ह्रदय विस्मृत करते ...बंदीग्रह के रक्षक द्वारपालों की स्मृति को छिन् भिन्न करते ..उस मधुकर के स्वागत में नीर भरी पलकों से याचना करते ..यत्र तत्र सर्वत्र विराजित प्रतीक्षा रत थे .....
आनंद और आतुरता का अद्भुत संगम था ...यमुना उठ उठ कर श्याम मेघों को ह्रदय लगाती थी तो कृष्ण घन झुक झुक कर यमुना को स्पर्श कर अपनी प्रसन्नता का प्रदर्शन करते ...मेघ और यमुना दोनों नीर से भरे परन्तु अथाह क्षुधा से पीड़ित ....
सावन माह में कैलाश जाकर इन मेघों ने नीलकंठ की विष से उद्यत अग्नि को गंगा के साथ मिलकर शांत किया था ....इन्ही मेघों ने भाद्रपद मास में वन्मयुर के साथनृत्य उत्सव का प्रयोजन किया ....तब ही तो कान्हा के प्रिय मयूर ने उन्हें अपने लंबे , घने पंखों से रिझा लिया ....नित्य उनके केश सौंदर्य हेतु उन्हें इन्द्रधनुषी छठा लिए नीलाभ पंख प्रदान किया करते थे ....
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्य रात्रि अभिजित नक्षत्र का योग और प्रभु के अवतरण की बेला ....बहार आकाश में दामिनी कड़क कर पहरेदारों को भयभीत कर अपनी कोठरियों में सोये रहने को विवश कर रही थी ...और अपनी चमक से वासुदेव के गोकुल गमन के मार्ग को प्रकाशित कर रही थी .....
यमुना ने प्रभु को अपनी और आते देखा तो पहले उनके चरणों का स्पर्श कर नमन किया ...और उनके मुख को देख तृप्त हो वासुदेव के प्रस्थान हेतु जल को दो भागों में विभाजित कर मार्ग प्रदान किया .... यमुना में आई बाढ़ और वर्षा थम गई ....जल के विभाजन से यमुना की चमकीली रेत दिखाई देने लगी ....मध्य में रेतीला मार्ग और दोनों और यमुना जल की प्रचंड दीवारें .....वासुदेव कृष्ण को उठाये उठाये हुए अग्रसर हुए .... ज्यूँ ज्यूँ वासुदेव आगे बढ़ते जाते ....आगे का मार्ग प्रदीप्त होता जाता ...तथा पीछे जल की दीवारें फ़िर जुड़कर , प्रभु को नमन कर अपने निर्दिष्ट की और बढती जाती ....
समस्त वातावरण में व्याप्त हुई निःशब्दता , शुन्यता को देखकर प्रतीत होता था की समस्त प्रकृति संरचना प्रभु की लीला को कंस से अज्ञात रखना चाहती हो ....
प्रातः की किरण एक नए सवेरे का संदेश लेकर सारी नगरी में उतरी ....सवेरे की इस किरण में मुरली की अद्भुत , मनमोहिनी तान सुनाई दे रही थी परन्तु बजा कौन रहा था , कोई नही जनता था ... नन्द बाबा सवेरे स्नान कर घर वापस आए तो देखा उनके घर उत्सव का आयोजन हो रहा है ...ग्वाल बाल उधम के साथ घोष कर रहे थे ....नन्द के घर आनंद भयो , जय कानहिया लाल की ...हाथी घोड़ा पालकी ....
बालक का मेघश्याम सा रूप देखकर मन ही मन मोहित होते नन्द ने बालक के सर पर नील्हारित मयूर पंख निर्मित मुकुट सजा कर उसे चूम लिया और बालक को नाम दिया ....श्री कृष्ण

Saturday, August 8, 2009

घुटन

एक लंबे अन्तराल के बाद आज ब्लॉग को पढ़ना अच्छा लग रहा है ...डॉक्टर के परामर्श के अनुसार बेड से ख़ुद को जकड लिया था ...उफ़ कितना मुश्किल ये आराम करना भी ....सारा दिन फ़ोन पर लोगों को अपनी सलामियत की ख़बर देना और आने जाने वालों के सामने अपना बीमार चेहरा दिखाना मुझे बिल्कुल पसंद नही ... इसी बीच मेरी कहानी " घुटन " प्रोपर्टी एक्सपर्ट मैगजीन में प्रकशित हो कर आ गई जिसका कुछ अंश यहाँ मौजूद है ...
तेज बौछार के बीच अनंत की कार भीगी हुयी सड़क पर दौड़ती जा रही थी , पर उसकी जिन्दगी तो जैसे थम ही गई थी ... कार के वाईपर विंड स्क्रीन पर तेज तेज घूमते हुए सारा पानी नीचे गिरा देने को बेताब थे , पर कामयाब नहीं हो रहे थे...पानी ही इतना पड़ रहा था ...वाईपर जितना अपनी अंजुली में पानी को समेट कर फेंकता , फ़िर उतना पानी ऊपर से आ गिरता ...अनंत को लग रहा था की उसके आंसू बारिश का रूप धर कर आसमान की आंखों से गिर रहे हों ...वह तो चाह कर भी नहीं रो पा रहा था की कहीं कोई उसे देख न ले ...वैसे तो दिल्ली , मुंबई जैसे बड़े शहरों में किसी को किसी के गम से कोई वास्ता नहीं होता ...फ़िर भी वो किसी गैर के सामने रोना नहीं चाहता था ...वह कार को एक तरफ़ रोक कर फुटपाथ पर राखी हुयी बेंच पर बैठ गया ...तदाताड़ पड़ती बूंदों ने उसे एकदम गीला दिया था पर उसे इसकी परवाह नहीं थी ...शायद इस ठंडे पानी और ठंडी हवा से ही उसके सुलगते दिल को राहत मिल जाए और बरसात में उसका भीगा चेहरा देखकर कोई जान भी नहीं पायेगा की उसके आंसुओं ने इस बरसात को खारा बना दिया है ...एक तूफ़ान उसके अन्दर जन्म ले चुका था ...जिससे उसकी पूरी जिन्दगी में हलचल सी मच गई थी उसके ह्रदय की चीख उसके कानो तक आ पहुँची थी ...पता नहीं ये शोर अन्दर के तूफ़ान का था या बाहर का पर उसका जिम्मेदार तो वह स्वयं ही था ...ये हलाहल तो उसने स्वयं ही पैदा किया था ...उसे याद आ रहा था वह मनहूस दिन जब .............
आगे की कहानी पढने के लिए http://www.ezinemart.com/propertyexpert/01082009/home.aspx?userid= लिंक पर क्लिक करें

पेज नम्बर ९४ -९५ पर आगे की कहानी पढ़ सकते हैं....

Saturday, July 18, 2009

जिंदगी को धुएँ मे उड़ाता....


धुँआ धुँआ जिंदगी
उड़ी जा रही
बिखर रहा है
सब कुछ यहाँ
वक़्त से कह दो
यहाँ रुके
कोई नहीं जो
दे आवाज़ मुझे
मुस्कुराहटें मे
ऑड लूँ ज़रा
पहन लूँ
कोई आईना
तिनका तिनका
बिखर गया है
ठहर जिंदगी
चुन लूँ ज़रा
उधड़ गये हैं
प्यार के धागे
चुभने लगे हैं
फूल भी यहाँ
रंग चुराए थे
आसमान से मैने
छूते ही मेरे क्यूँ
बदरंग हो गये
इंद्रधनुष रखा था
पलकों पे
ख्वाब लेके
तुम सो गये

Sunday, July 5, 2009



विरह के मारे
दो नैनो में
फ़िर उतर आई धूप ।
कल फ़िर बरसे थे बादल
सबकी आंखों से छुप छुप ।
कच्ची माटी की हांडी सा
रीता था मन ये मेरा ,
न मनन , न कोई चिंतन ,
अटखेली करता था हरदम ,
प्रेम जल जब से भर गया है ,
आशंकित है , भयभीत है ,
मन ये मेरा ,
रूठे जाए है ,
तडपत जाए है ,
आओ फ़िर हमें ,
मना लो तुम .....

Sunday, June 21, 2009

ये रिश्तों की प्यास ...



अगर कोई अपने अतीत का लेखा - जोखा करे , तो उसे अपनी जिन्दगी में ही अनेक अलग अलग किस्म की जिंदगियों के सूत्र मिल सकते हैं । यह संयोग की बात है की किसी एक दिन गलती से या शायद अपनी इच्छा से एक ख़ास किस्म की जिन्दगी चुन लेता है और आख़िर तक उसे निभाए जाता है । सबसे शोचनीय बात तो ये है कि वे दूसरी जिंदगियां , जिन्हें उसने नही चुना ....मरती नहीं । किसी न किसी रूप में वे उसके भीतर जीवित रहती हैं । हर आदमी को उनमे एक अजीब से पीड़ा महसूस होती है ...जैसे टांग के कट जाने पर होती है ।



उन दिनों जब मुझ पर टिकट जमा करने कि धुन सवार हुयी थी , मेरे पिता को मेरा यह शौक ज्यादा पसंद नहीं था । यह स्वाभाविक भी है क्योंकि वास्तव में अधिकाँश लोग यह नहीं चाहते कि उनका पुत्र कोई ऐसा काम करे , जिसे उन्होंने स्वयं कभी नहीं किया । पुत्र के प्रति पिता कि भावना अंतर्विरोधों से भरी रहती है ...स्नेह तो उसमे अवश्य होता है किंतु उसमे एक हद तक पूर्वग्रह , अविश्वास और विरोध के तत्व भी मिले रहते हैं । आप अपने बच्चों को जितना प्यार करते हैं , उतनी ही मात्रा में विरोध भी ...और यह विरोधी- भावना स्नेह के साथ साथ बढती जाती है ।



कारेल चापेक( टिकटों का संग्रह ) की इस कहानी में पिता और पुत्र के रिश्ते का जो वर्णन किया गया है अद्भुत है ...सच ही है हम सभी एक बनावटी जिन्दगी जीते जाते हैं जो असली जिन्दगी में था उसे कभी पहचान ही नहीं पाते ....बैसाखियों के सहारे चलती इस जिन्दगी में छिपे हुए स्नेह को पहचानने कि ताकत हम्मे है ही कहाँ ....



Saturday, June 6, 2009

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन ....

वो बीज ,
अपने सारे अरमान ,
नवयुग का जो करे निर्माण ,
लेकर अपने सीने में ,
छुपा हुआ था
धरती के अंधकारमय गर्भगृह के भीतर ।
पाकर सावन का गीला सा स्पर्श ,
म्रदुल और स्वप्निल हवाओं का ,
थाम कर दामन ,
प्रतिक्षण नवीन ऊँचाइयों तक
जाने को बेचैन था मन ।
मगर हवा यहाँ की बदली है ,
खेतों की जगह इमारत ने ली है ,
अब भी सावन बरसा करता है ,
अब भी सूरज ने अपना पथ नही बदला है ,
पर वो बीज ....
वो बीज ,
इन सब के बीच ,
अपने अरमानों की
जड़ें ढूँढा करता है ....

Wednesday, May 27, 2009

शिकायत नही ज़माने से ...


आज दिल ने फ़िर तमन्ना की ...कोई ग़ज़ल लिखी जाए ....शब्द ...! शब्द ...ह्म्म्म कहाँ से शुरू की जाए ....सागर , समंदर , आसमान , किताबें ,पेड़ , हवाएं , ....कहाँ से शुरू करूँ .....ये आसमान ये बादल... ये रास्ते... ये हवा ...
हरेक चीज़ है अपनी जगह ठिकाने पे ...कई दिनों से शिकायत नही ज़माने से ....


ऊँची लहरों में मुझे कश्ती तैरना आ गया ,
साहिल से वादा निभाना आ गया ....
जिन्दगी अश्कों से आशना न थी ,
हमको भी गम छुपाना आ गया .....
बिछड़ने की बातें मत करो यारों ,
कह दो यादों का मौसम सुहाना आ गया ...
बाद मुद्दत के मिली है तन्हाई ,
ख़ुद से बातें करने का ज़माना आ गया ...
चाहतों की बातें हैं ये तो ,
वरना उसे क्यों काम पुराना याद आ गया ....

Friday, May 15, 2009

संता क्लॉस

ऐसे तो अपने ही गम कम न थे ....जिन्दगी में बहारें कब आयीं .. कब जाकर सहरा को साथ ले आयीं, पता ही न चला था ....मसरूफियत और क्या ....फ़िर भी जिन्दगी की उतरती देहरी की शाम में भी उसने हिम्मत नही छोड़ी थी ...सोचा जिन खुशियों के सपने वो हमेशा संजोता रहा , उन्हें दूसरों के दामन में क्यों न डाल दिया जाए ...
पैसा तो ऐसा की घरोंदों की दीवारों में गिन्नियां जडी थीं ....फ़िर मुश्किल क्या ....निकल चल संता क्लॉज़ ....
गमो से जो भरा पड़ा हो दिल तो वह मांस का लोथडा बस धड़कता है , न हँसता है न रोता है ....ये दिल कम्बखत अपने दुखों से खाली हो तो खुशियों के लिए जगह बने ...पल दो पल की मेहमान खुशी के लिए दिल अपने कमरे का एक कोना खाली कर देता है .............बस ....
उसके लिए तो इतना ही काफ़ी था ...कोई दरवाज़ा, कोई झरोखा तो खुले फ़िर धीरे धीरे खुशी अपना साम्राज्य स्थापित कर लेगी ...
बस यही था संता क्लॉज़ बन्ने का फंडा....
इसी फंडे को लेकर घूमता रहा , घूमता रहा , घूमता रहा ...जो मिलता उसी के गम को अपने हार्ट बैंक में जमा कर लेता ....करता रहा ....और उनकी खिड़कियों को खोल आया था खुशियों के लिए
धीरे धीरे उसका हार्ट बैंक भरने लगा फ़िर भी वो उसे भरने में लगा रहा ....मैंने कहा लालच बुरी बला है ...नही माना ....
मत मानो ..मेरा क्या है ....न आशियाँ मेरा था न मेहमान मेरे ....
पर अब क्या ...अब हार्ट बैंक का खजाना मल्टी नॅशनल बैंक में जमा करना था ....इशु ..ईश ...रब्बा ... गौड, मल्टी नेशनल बैंक ...मल्टी नामो से उपलब्ध ....
तो ....चलें संता क्लॉज़ ......
हाँ ....अब बारी आ ही गई .....चलो .....

Saturday, May 9, 2009

माँ की पाती बेटी के नाम....

बेटियाँ तो होती हैं गंगा अविरल अनवरत प्रवाहमय,
दुर्गम मार्गों के बीच बनाती हैं अपनी राह,
चत्त्तन ह्रदयों के गर्व को अपने वेग से चूर करने वाली,
कौन रोक सका है गंगा, यमुना और सरस्वती को,
कितने ही बाँध बना लो अपनी सोचों के
कितने ही पत्थर लुढ़का लो संस्कारों की दुहाई के,
अपने उद्गम स्थल से निकली हैं गर ये गोमती,
लक्ष्य कर चुकी है तय प्रतिज्ञा की है अपने आप से,
फ़िर खोने का प्रश्न उठता ही नही,
लड़ती समाज के ठेकेदारों से, अपने ही किनारों से,
मंजिल पर जाकर ही दम लेंगी ये
अविरल, अनवरत, प्रवाहमय गंगा, ये हमारी बेटियाँ ....
कुछ पंक्तियाँ बेटियों के बारे में मुझे प्राप्त हुयीं
....ओस की बूँद सी होती है बेटियाँ,
स्पर्श खुरदुरा हो तो रोती हैं बेटियाँ,
रोशन करेगा बेटा तो बस एक ही कुल को
दो दो कुलों की लाज होती हैं बेटियाँ
हीरा अगर है बेटा तो सच्चा मोटी है बेटियाँ,
काटों की राह पे ख़ुद ही चलती रहेंगी,
औरों के लिए फूल बोथी हैं बेटियाँ,
विधि का विधान है ,यही दुनिया की रसम है,
मुट्ठी भर नीर सी होती हैं बेटियाँ,
घर के आँगन की तुलसी होती हैं बेटियाँ,
हर गम को खुशी में बदल देती हैं बेटियाँ
पोधों की शाख पर जब हरियाली न हो,
उन पोधों में रंग भर देती हैं बेटियाँ,
एक अनोखा रिवाज है जग में मेरे दोस्त,
माँ की ममता समेटी हैं बेटियाँ ....

Tuesday, May 5, 2009

चुनाव का मौसम

जब कुरुषेत्र में चुनावी महासमर का आयोजन किया गया तो पांडव और कौरव दोनों के पक्ष में बराबर वोट डले ....टाई हो हो गया था ...मामला फंस गया ...पार्टी दो ही थी ...तीसरी पार्टी होती तो गठबंधन सरकार बन जाती ....भीषण संकट उत्पन हो गया ....सोचा गया तो पता चला की कृष्ण जी ने अपना वोट डाला ही नही था ....महत्वपूर्ण वोट था ...डालना तो चाहिए ही....स्पेशल अर्रेंज्मेंट किए गए ....दोनों पार्टी के नेता ....(को पा-कौरव पार्टी )दुर्योधन और (पापा-पांडव पार्टी) अर्जुन, कृष्ण के पास गए ....हालाँकि अर्जुन पार्टी लीडर नही थे ...पर कृष्ण जी के मुहलगे चमचे थे ....सो युधिष्ठर के स्थान पर उन्हें भेजा गया ....

कृष्ण जी सो रहे थे ...दोनों जाकर पलंग पर बैठ गए ...बंसीधर की आँख खुली ....राजनीती कुशल तो थे ही ...लेटे-लेटे सारी बात समझ गए ....फ़िर राजमाता कुंती उनसे पहेले ही मिल चुकी थीं ....

कुंती क्रष्ण की बुआ थीं ...और इसके अलावा उनके उच्च पद से भली भांति परिचित थीं ...भाई भतीजा वाद काम आया ...कुंती ने उनके पास जाकर उन्हें संबोधित किया ..."हे प्रभु ! हम आपकी कृपा पर पूरी तरह से आश्रित हैं ...हमे सत्ता का शासन दिलाने वाला कोई दूसरा नही है ...उनका अभिप्राय कृष्ण के हस्तिनापुर में रह कर पांडवों के पक्ष में वोट डालने से था ...

तम्स्ये पुरुषं त्वध्मिश्वरम प्रक्रते परम ,

अलाक्ष्यम सर्वभूतानामअन्त्बहिर्व्स्थितम ।

श्रीमती कुंती ने कहा - में आपको नमस्कार करती हूँ ...क्यूंकि आप आदि पुरूष हैं और इस भौतिक जगत के गुणों से निसंग रहते हैं ....आप समस्त वस्तुओं के भीतर तथा बाहर स्थित रहते हुए भी सबों द्वारा अलक्ष्य हैं ....

कुंती ऐसी प्रबुद्ध महिला थीं की अच्छी तरह जानती थीं की उनका भतीजा सत्ता पलटने की ताकत रखता है इसलिए उन्हें सर्व शक्तिमान , आदि पुरूष के रूप में संबोधित किया ...

समोहयम सर्वभूतेषु न में दवेस्ह्योयस्ती न प्रियः ,

ये भजन्ति तू मम भक्त्या मयी ते तेषु चाप्य्हम ।

में न तो किसी से द्वेष करता हूँ , न ही किसी के साथ पक्षपात करता हूँ ...में सबों के लिए सम्भव हूँ ....किंतु जो भक्ति पूर्वक मेरी सेवा करता है वह मेरा मित्र है ....यह कहकर कृष्ण ने अपना वोट पांडवों के पक्ष में दिया ....सत्ता के चुनावी महासमर में पांडवों को जीत दिलाकर शासन दिलाया और युधिष्ठिर को सत्तारूढ़ कराया ...

अब देखा - एक वोट भी कितनी महत्वपूर्ण है ...

अतः -सही निर्णय , सही चुनाव , सही नेता ....कुछ समझे .....

Friday, May 1, 2009

आतंकवाद...



तपता रेगिस्तान ,
खामोश गलियां ,
सुनसान मकान ,
बस पांवों के ,
चंद निशान,
पत्थर के बुत ,
गूंगी ज़बान ।
भटकती मृग तृष्णा ,
भटकता जहान ,
बोलता वीराना ,
सुनते मकान ,
फैली भयावहता ,
कांपा श्मशान ।

Wednesday, April 22, 2009

एक पहलू

हनीमून जोड़ा बैठा है
शाहजहाँ मुमताज की कब्र पर
हाथों में हाथ डाले
आँखें बंद कर ...
जैसे उनकी रूहों से
प्रार्थना करते हों
उनके जैसा प्यार
हमारे बीच रहे सदा ....
फ़िर चक्कर लगाता है
कब्र के चारों और
जैसे उनका प्यार चुरा रहा हो
कब्र से
जैसे कोई मांग ले
तकलीफें किसी की ...
सच्चे दिल से निकली दुआ
कुबूल होती है
पर अब जिस्म हैं
रूहें कहाँ
कहने को प्यार है
पर दिल कहाँ
यहाँ मकबरे से बाहर जाने के बाद ...
वो हनीमून जोड़ा
कुछ ही समय में
बन जाता है सिक्का
और वो दोनों
सिक्के के दो पहलू....
जो साथ रहते तो हैं
मगर
एक दूसरे का चेहरा कभी नही देखते
फ़िर भी हनीमून जोड़े आते रहेंगे
मकबरे पर जाकर
प्यार की लम्बी उम्र की
दुआ मांगते रहेंगे
सदा.... सदा ....सर्वदा ....

Thursday, April 16, 2009

उसकी हँसी ....


वो नही हंसती ....बिल्कुल नही हंसती ...कभी आप उसे हँसते हुए देख ही नही सकते .,....बल्कि मै तो कहूँगी की आप उसे देखें तो कहेंगे की इसे किस बात का दुःख है ....सब कुछ तो है उसके पास ...क्या सारी दुनिया के दुखों का ठेका इसी ने ले रखा है ....उसके सामने आप कुछ भी हँसी मजाक कर लें पर मजाल है जो कभी उसके चेहरे पर हँसी के दो कतरे भी उभर आयें ....क्या नहीं है इसके पास ...अच्छी खासी बैंक में नौकरी करती है , अपना मकान है .... वंही किसी से शादी कर घर क्यों नही बसा लेती ...कोई रोकने टोकने वाला तो है नही ....
हाँ ......
यही तो दुःख है उसे ...अब सही समझे आप.... कोई रोकने टोकने वाला नही है ....मम्मी - पापा ..दोनों में से कोई नही ....काश! कोई उसके सर पर हाथ रखने वाला होता ...क्या ग़लत है , क्या सही , बताने वाला होता ...पर ...
चाहने से क्या होता है ....
उनके बाद जिन भाई बहन का सहारा दिया भगवान् ने ..उनके घर बसा कर उसने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली ....
भाई अपने हिस्से का मकान ले कर अपने परिवार के साथ खुशी से रहता है ...अब ये मत पूछना उसके हिस्से में क्या है .....क्यूंकि वहां दर्द के सिवा कुछ नही मिलेगा ....चार दीवारों के साए जब आपस में बातें करते हैं तो घर और भी भयानक लगने लगता है .... बाहर की दुनिया ॥! हूँ ॥! पूरा गाँव ही लुटेरा लगता है ....
कोई तो होता जो हक से कहता , ये लड़का मैंने तेरे लिए पसंद किया है , तुझे इसी से शादी करनी है ....तब शायद उसे आपत्ति होती ....पर अब उसे किसी बात से आपत्ति नहीं है ....
अब समझे आप वो क्यूँ नही हंसती ...?
पर ऐसा नहीं है वो कभी हँसी ही नहीं ....उसने हसीं को देखा ही नहीं , भरपूर जिया भी है ...जब वो मेरे साथ पढ़ती थी ...जी हाँ हम दोनों साथ साथ पढ़े हैं ....हाँ तो ....जब हम पढ़ते थे तो वो बात बात पर खिलखिला कर हंसा करती थी ....बल्कि ख़ुद ही ऐसी बातों की शुरुवात किया करती थी की सब सहेलियां हंस पड़ती थी ....सात आठ लड़कियों का ग्रुप बना कर लीडर बनी फिरती ....एक बार तो प्रिंसिपल के अगेंस्ट आवाज़ उठाई ...वो आगे आगे चल रही थी ....

याद करके मुझे आज भी हँसी आ जाती है ...प्रिंसिपल थी हमारी कड़क ...रोबदार ....उनको देखते ही सबकी सिट्टी -पिट्टी गुम ...एक आवाज़ में सब की सब अन्दर क्लास में ....फ़िर अन्दर जाकर हम सब खूब हँसे ...

पर आज उसे बिल्कुल हँसी नहीं आती ......आप उसका नाम जानने को उत्सुक होंगे ...पर माफ़ करियेगा ...मै उसका नाम नही बताऊंगी .....बस वो जहाँ भी रहे खुश रहे ....आबाद रहे ....

Wednesday, April 15, 2009

शाम-ऐ-जिन्दगी

जिन्दगी हर्फ़ बन कर रह गई अब
किताब की शक्ल में छप कर रह गई अब।
माजी से पलटो कुछ वरक
खुशबुओं से रूह नहा जायेगी ,
जहाँ तहां से सिमटी थी खुशियाँ
दीवारों से चिपक कर रह गई अब ।
वो गुजरे ज़माने की बात थी कभी
वो झगडा वो तकरार सभी ,
वो हसीं घूम फ़िर कर
होठों पे नाचा करती थी तब ।
शब्द बन कर बेजान हो चुके हैं जो
उन फूलों पे जिन्दगी लौट कर ना आएगी ,
कह दो चमन से जाकर कोई
शाम जिन्दगी की होने लगी अब ।
चाँद आए ना आए क्या फर्क पड़ता है
रात हो ना हो क्या फर्क पड़ता है ,
दिन भर ख़ुद से बातें करते हैं
रात को भी हम सोते नही अब ।


चलते चलते .....

बर्फ से पिघल गए आंसू
बनकर अंगार जल गए आंसू
कितना थामा था ख़ुद को महफ़िल में
लफ्ज़ बनकर निकल ही गए आंसू

Friday, April 10, 2009

मेरी आस्था .....

एक ज्योतिष ने कहा ....
बरगद की पूजा करो
धन धान को
लक्ष्मी निवास को
आरोग्य वास को
भाग्योंन्नती को
एक दिया रोशन करो
पर कहाँ ...?
हरियाली कहीं नज़र नही आती
इमारतों की परछाई में भी
वो छांव कहाँ
बहुमंजिली ईमारत के पांचवे माले पर
बरगद उगा भी नही सकती
नर्सरी जा कर बरगद का बोनसाई
ले आई हूँ
अब नित दिए की रौशनी
दिखाती हूँ बरगद को
बदलता परिवेश
आस्था कैसे मगर बदले
गगनचुम्बी ईमारत
बोने होते खेत
हरियाली बचने की कोशिश में
बोना बाग़ लगाती हूँ
अब गमलों में
बरगद, अशोक , अमरुद ,
संतरा और सेव उगाती हूँ ....





Tuesday, April 7, 2009

अग्नि पथ

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
वृक्ष हों भले खड़े ,
हों घने , हों बड़े ,
एक पात्र - छांह भी मांग मत , मांग मत , मांग मत !
अग्नि पथ ! अग्नि पथ ! अग्नि पथ !
तू न थकेगा कभी !
तू ना थमेगा कभी !
तू ना मुड़ेगा कभी !
कर शपथ ! कर शपथ ! कर शपथ !
यह महान द्रश्य है -
चल रहा मनुष्य है ,
अश्रु -स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ , लथपथ !
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ !
हरिवंशराय बच्चन

Sunday, April 5, 2009

दोस्ती .... अब वो कहाँ

दोस्ती का वो अदब अब है कहाँ
जिस्म के शिकार हर तरफ़ यहाँ ।
भटकती हैं राहें यारां चारो सिम्त
कौन जाने किसकी मंजिल है कहाँ ।
गा रहा है दीवाना मलंग कोई
ना मै यहाँ हूँ ना तू है वहाँ ।
वो तो मौसम ही मेहरबान हो गया था
वरना तेज धूप में बरसात कहाँ ।
टूटे कांच सा चुभता है हर लम्हा
तुमने महसूस किया है ये दर्द कहाँ ।
हँसते हँसते आंसू पी जाते हो तुम
आंसूओं के साथ जीते है हम यहाँ ।

किनारे पर .... ज़िन्दगी

मरे मन की तरंगों सी
उठती हैं सागर में हिलोरें
पथरीले किनारों सी टकराकर
करती हैं जाने क्या बातें ।
बेजान से दिखने वाले
सह्रदय किनारे
सब कुछ सुनते हैं
पर खामोश रहते हैं ।
व्यथा अपने में समेट कर
उसे मर्यादा में बंधे रहते हैं ।
भावनाओं के साथ बह जाना
शायद इन्होने नही सीखा है
तभी तो इनका ह्रदय भी
इनके जैसा पथरीला है ।
समय के थपेडों ने घिस घिस कर
चिकना बना दिया है
वक्त की काई भी जम गई है ।
अब तो सागर को भी
इन पत्थरों से सर मारने की
आदत सी हो गई है ।

Tuesday, March 31, 2009

अब कहाँ जाया जाए....

दुःख से हम अपने ही भर गए जब,
छलकने को थी
ये गगरी लबालब
पीड़ा अंतस समाती न थी ,
दुनिया खुशी के गीत गाती थी ,
कुछ खिले खिले से चेहरे ,
खुशियों में डूबे शब्द ,
होठों पर आकर गुनगुनाते थे ,
सर्द भरी भरी स्याह रातों में ,
गर्माहट का अहसास करते थे ,
ऐसे में बैठे हैं हम यहाँ ,
खुले आँगन में ,
आकाश के नीचे ,
......
क्यूँ न इस आकाश से कह दें
अपनी अंतस की पीड़ा ,
और मुक्त हो जायें ,
अपने द्वंदों से ,
पर ...
आकाश तो अभी अभी खाली हुआ है ,
रात भर बरसी थी
इसकी आँखें ,
लाल डोरे पड़े थे
सुबह तलक।
फ़िर....
किसी जंगल में जाकर ,
वृक्षों की कतारों से कह दें ,
पर ...
उन्होंने भी रात भर
दुःख बांटा होगा अपना ,
नही देना उनको और यातना,
कहीं गमो की आंच
से जल न जाएँ ,
अनकही बातें कहती शाखों पर ,
तरस यूँभी आ जाता है ,
कौन है यहाँ ,
जो सुने दुःख मेरा ,
कौन है जो बांटे अंतस की पीड़ा ,
ये कोमल गुलाब!
जो कांटो का सामना करते हैं ,
हर वक्त ख्वाब खुशी के देखा करते हैं ,
छुओ इनके गाल ज़रा
आंसू से भीगा पाओगे ,
न कही गई जो बात कभी,
वो ख़ुद ही जान जाओगे ,
आवरण ओढे बैठा हर शख्स ,
खुशियों का आयोजन करता है,
समंदर साथ रखकर अपने ,
इंसान प्यासा ही रहता है ,
ऐ , मेरी प्यारी आंखों ,
खोल दो दरवाज़े,
और,
सैलाब बह जाने दो,
समंदर रिक्त हो जाने दो ,
खुला खुला आँगन होगा ,
शून्य का प्रयोजन होगा,
पूर्णता का संगम होगा.....

Saturday, March 28, 2009

नंबर दो

पूरी कालोनी में ताईजी उपनाम से विख्यात सरोज आंटी को मै भी ताईजी ही कहती हूँ ....बुजुर्ग होने के नाते ही नही वरन एक समझदार महिला होने के नाते मै उनका ह्रदय से आदर करती हूँ........

उस दिन पार्टी ख़त्म होने के बाद हम सब ताईजी के साथ बैठे थे ..........कन्या भ्रूण हत्या , बेटे और बेटी में भेदभाव् जैसी सामाजिक समस्याओं का जिक्र चल रहा था .........ताईजी की पुत्रवधू कहने लगी ....मम्मी को तो लड़कियों से बहुत नफरत है .........वो तो कहती हैं की लड़कियों को पैदा ही नही होना चाहिए ............या मार दिए जाने की ख़बर पढ़ती हैं तो कहती हैं अच्छा हुआ ..........मै हैरान थी ये सब बातें सुनकर ..... उसकी बातें मै हजम नही कर पा रही थी ..........क्योंकि ताईजी को मै अपना आदर्श मानती हूँ ...........पर आज तो उनका एक नया ही रूप मेरे सामने था .........क्या बोलूं .....? कुछ समझ ही नही आ रहा था ..........पर यूँही खामोश तो नही बैठ सकती .........सभी चुप थे ........बुजुर्ग हैं .........क्या बोलें .........समझाने का भी कोई फायदा नही ...........आख़िर मैंने चुप्पी तोडी .........ताईजी ....! कम से कम मै तो आप से ऐसी अपेक्षा नही करती .........मैंने तो कभी सोचा भी नही था आप जैसी समझदार महिला भी लड़कियों के ख़िलाफ़ हो सकती है .......मानती हूँ अभी भी दुनिया में लड़कियों के साथ दुर्वयवहार किया जाता है .........पर आप तो ऐसा न सोचें .........कौन से काम हैं आज ..जो बेटियाँ नही कर सकतीं ........मैंने अल्पविराम लिया ही था .....ताईजी ने जो बोला ....उसे सुनकर मै तो क्या सभी की बोलती बंद हो गई ........और उन्होंने मुझे भी अपनी सोच पर दुबारा सोचने पर मजबूर कर दिया .......उन्होंने कहा ....इतनी सब तरक्की करने के बाद भी लडकियां कहाँ हैं .......क्या उन्हें समाज में वो अधिकार प्राप्त हैं जो लड़कों को ......घर हो या बाहर ...नम्बर एक तो लड़का ही रहता है .......और लडकियां नम्बर दो ........मै इसीलिए लड़कियों के जन्म पर रोती हूँ ........सचमुच ये बात कहते कहते उनकी आँख से आंसू बहने लगे थे ......

अब आप ही बताइए आप लड़कियों को किस पायदान पर रखते हैं ..........नुम्बर एक या ..........

Thursday, March 26, 2009

हिंदू नव वर्ष की शुभकामनायें

आशाओं का दीप जलता हो ,
आकान्शाओं का फूल खिलता हो ।
नज़रों से प्रेम झलकता हो ,
प्यार का गुलशन महकता हो ।
ह्रदय सुमन फ़िर खिलते हों ,
बच्चे हरदम हँसते हों ।
खेतों में बस्ती हरयाली हो ,
घर घर में चहकी खुशहाली हो ।
कार्मुक वहां पर बनते हों ,
महि गगन जहाँ पर मिलते हों ।
दुश्मनी की न बात हो ,
एकता का काव्य पाठ हो ।
प्यारा सा एक जज्बा हो ,
माटी पर तन मन वारा हो ।
दिलों में तिरंगे की तस्वीर हो ,
हर बच्चा इसकी तदबीर हो ।
फ़िर से ये आह्वान हो ,
देश की ऊँची शान हो ।
जन जन फ़िर जाग्रत हो ,
उन्नत सम्रध मेरा भारत हो ।

कल से संवत २०६६ शुरू हो रहा है । सभी पाठकों को नव वर्ष की शुभकामनाएं ।

Tuesday, March 24, 2009

कुछ लम्हे प्रकृति के साथ ....

आज फ़िर सूरज मिटटी में खेला दिन भर ,
हवाओं के संग आवारा बन फिरता रहा दिन भर ।
सुबह तो खूब बन ठनकर आया था ,
सब दिशाओं के मन को खूब भाया था ,
ज्यों ज्यों सजा रूप सलोना त्यों त्यों इतराया था ,
यौवन की रूत आते ही मदमाया दिन भर।
आज फ़िर सूरज मिटटी में खेला दिन भर ....
कभी पानी पर पाँव रखा ,
कभी पेडों पर दौड़ लगायी थी ,
कभी इस बादल के पीछे छुप कर ,
उस बादल को खूब छकाया था ,
मनमौजी मस्ताना यूँ ही कुलांचें भरता रहा दिन भर ....
आज फ़िर सूरज मिटटी में खेला दिन भर .....
अब चाँद की बारी आई ,
सूरज तुमको जाना होगा ,
बड़े ही गंदले दीखते हो ,
नहा धो कर आना होगा ,
कल मिलने का वादा करते जाओ
रात भर विश्राम करेंगे ,
फ़िर मिलकर साथ काम करेंगे दिन भर ।
आज फ़िर सूरज मिटटी में खेला दिन भर ....
हवाओं के संग आवारा बन फिरता रहा दिन भर ....

Thursday, March 19, 2009

कलयुग के राम

कल पढ़ा
स्त्री की अग्नि परीक्षा
ली समाज के ठेकेदारों ने
जो तय की गई थीं
वर्जनाएं स्त्री के लिए
उनका उल्लंघन करने की जुर्रत
वो भी एक स्त्री होकर
उफ़....
राम राम राम ....
हाये अबला
ये तूने क्या कर डाला
परिणाम तो अब भुगतना पड़ेगा
अग्नि परीक्षा तो सीता ने भी दी थी
तू किस खेत की मूली है .....
सोचती हूँ
निर्णय पूर्णतय न्यायसंगत था
सौ कोडे और लगाने थे ,
थोड़े अंगारे और बरसाने थे
शूलों पर चलवाना था
इन चरित्रहीन स्त्रियों को
ऐसे ही छोड़ दिया तो
कल इतिहास क्या कहेगा
आने वाली पीडी को
क्या संदेश पहुंचेगा
इसीलिए फिर कहती हूँ
अग्नि परीक्षा उचित थी
मर्यादा पुरुषोत्तम राम के कहने पर
वैदेही ने भी
अग्नि में प्रवेश किया था
अपनी पवित्रता का प्रमाण
जग को दिया था
पर .....
आज की सीताओं की
परीक्षा लेने वालों
अग्नि प्रज्वलित करने से पहले
अपने चोले में झांको
अपने अपने मुखौटे उतारो
और पहले
मर्यादा पुरुषोत्तम राम तो बनो .....

Monday, March 16, 2009

armaan

जब भी खवाबों से जागो तो सवेरा मिले
जब भी हो चाहत कुछ पाने की वो हमेशा मिलें
खुशी वही होगी जो आँखों में दिखेगी
उसे खुशी मत समझो जब लब हिलें

Sunday, March 15, 2009

मैं समय हूँ.....

सुबह सुबह अखबार में ब्लॉग के बारे में
पढ़कर महसूस हुआ क्यूँ न में भी
पहला काम नाम क्या दूँ
फिर सोचा थीम क्या होगी, लिखूंगी क्या
बहुत नामों पर दिमाग घूमा कभी ये, कभी वो ....
फिर दिल ने कहा यह ठीक है....
पुखराज
यह मेरा पहला पोस्ट है तो बात
की जाय समय की ....
शुरुआत करते हैं यहाँ से
बुद्धू बक्से के छोटे परदे से
आसमान पे एक धब्बा उभरा
कुछ लकीरों से शुरू होकर
भाग्य चक्र में बदला
कुछ आँखे फिर चेहरे उभरे
कुछ खामोशी के बाद आवाज़ आई
मै समय हूँ.....
अरे...
तुम समय हो ...
तुम्हे तो कबसे ढूँढ रहे थे
बोलो अब तक कहाँ थे
आजकल बसेरा कहाँ करते हो
तुम्हारे आने जाने का रास्ता कौन सा है
किसके साथ उठते बैठते हो
सवालों पर सवाल
इंसानी फितरत
पर समय
गुमसुम और बेखयाल
परछाई तुम्हारी बन कर रहता था
प्रतीक्षा तुम्हारी करता था
रात रात भर जाग कर
सुबह से बातें करता था
मै तो हमेशा यहीं था
तुम ही नही थे ....
प्रतीक्षा में तुम्हारी थक गया हूँ
सूनी दीवारों के बीच मर गया हूँ
आज आए हो मुझसे पूछने
मै कहाँ था
तब तुम नही थे
अब मै नहीं हूँ
अब में कहीं नहीं हूँ
सबको मेरी ज़रूरत है
पर अब मै किसी के पास नही हूँ
तुमने मेरी हत्या की है
अब मै कहीं नहीं हूँ .....