वो बीज ,अपने सारे अरमान ,
नवयुग का जो करे निर्माण ,
लेकर अपने सीने में ,
छुपा हुआ था
धरती के अंधकारमय गर्भगृह के भीतर ।
पाकर सावन का गीला सा स्पर्श ,
म्रदुल और स्वप्निल हवाओं का ,
थाम कर दामन ,
प्रतिक्षण नवीन ऊँचाइयों तक
जाने को बेचैन था मन ।
मगर हवा यहाँ की बदली है ,
खेतों की जगह इमारत ने ली है ,
अब भी सावन बरसा करता है ,
अब भी सूरज ने अपना पथ नही बदला है ,
पर वो बीज ....
वो बीज ,
इन सब के बीच ,
अपने अरमानों की
जड़ें ढूँढा करता है ....