Monday, August 18, 2014




      चाँद जब तक दूर है , कितना अच्छा लगता है   … 





अपने दोस्त को गांव से आया देख                            
उससे रुका नहीं जा रहा था ,
हाल जानने का उतावलापन
चेहरे पर साफ़ नज़र आ रहा था ,
पत्नी ने खाना परोसा तो ,
गांव में जलते चूल्हे से उतरी
गरम रोटी , छौंकी हुई दाल
और धुएं वाले  मट्ठे की खुशबू ,
आँखों के आगे तैरने लगी ,
" क्या अब भी वहां वैसे ही दिन उगता है
वैसे ही रात ढलती है ? "
वो पूछना चाहता था ...
वो पूछना चाहता था ,
क्या अब भी वहां की मिटटी
बरखा की बूंदों से महका करती है ?
क्या अब भी नहर गांव के शैतान लड़को
की राह देखा करती है ?
अब भी पानी में छपाक कूदने की आवाज़ों से
सुबह की नींद खुला करती है ?
कितनी आहटें
उसके द्वार खटखटाने लगी थी
इनमे उसका बचपन था ,
किशोरावस्था थी ,
योवन था , भोलापन था ,
इनमे उसकी भूली यादें थी
खुशियो वाली चाबी थी ,
लड़ना मचलना था
पहियों का गोल गोल घूमना था ,
पत्थरों का तड़ा तड़ी वाला खेल था      
उसकी चोटों का मीठा सा दर्द था ,
जाने कितनी आहटें
जिन्हे वो ठुकरा आया था
वो सब जानने को उत्सुक था |

तुम्हे क्या बताऊँ   दोस्त ,
हमारा गांव अब गांव नहीं रहा ,
छत को देखते दोस्त की
ऑंखें कह रही थी ,
घर में खलिहान की और
खेत में बहन की
आबरू न रही ,
वो गोल गोल घुमते पहिये की
दुनिया न रही .
सोचा शहर में बच्चे पढ़ लिख जायेंगे
कुछ तमीज सीख जायेंगे
कुछ बन जायेंगे ,
वरना पत्थरों से लकीरें खींचकर
अपने ख़ुदा उगाएंगे ,
असलहों को तकिये के नीचे
रखकर सोते हैं
अब गांव में ऐसे हम जीते हैं |

हर आँख में यादों का
काफिला चलता है ,
चाँद जब तक दूर है
कितना अच्छा लगता है |






































1 comment:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सच, बहुत मुश्‍कि‍ल है गांव को अछूता रख पाना