Monday, April 7, 2014






आंधी से सैलाब से 
कब डरी हूँ मै , 
शोला हूँ चिंगारी हूँ 
लपटों में घिरी हूँ मै  , 
हालात ऐसे आते हैं 
जो मुझे डराते हैं , 
पैदा करने वाले ही 
मुझसे कतराते हैं , 
इश्क़ के नकली फूल 
मेरी कब्र पर चढ़ाते हैं , 
प्यार के थोथे समुन्दर से 
डूब के उबरी हूँ मै। ....... 

माला में पिरा 
मोती नहीं , 
दीप है पर 
ज्योति नहीं , 
तन्हां हूँ मगर अपनी 
आस छोड़ती नहीं, 
किनारा हूँ लहरों का 
मर्यादा अपनी 
खोती नहीं , 
अंसुअन तन 
भीगी हूँ मै ,
ताप में तप के 
तप तप के 
निखरी हूँ मै। …

देह तो इच्छा मात्र है , 
ह्रदय पहुँच से बाहर है , 
छूना बस एक किर्या है , 
स्पर्श तो संज्ञा है । 
कहने को देवी हूँ मै 
नज़रों ने तो लूटा है , 
नभ में तारा नहीं 
इस बार चाँद टूटा है , 
किताबों के कवर पर 
खूब बिकी हूँ मै ,
सुनहले इतिहास में 
कब लिखी हूँ मै.…… । 
















2 comments:

संजय भास्‍कर said...

आपकी रचना पर कोई टिप्पणी करना सूर्य को दीपक दिखाना ही होगा , हम आपके सामने अभी बहुत छोटे है । आपसे और आपके लेखन से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा इस आशा के साथ आपको और आपके लेखन को सलाम करते है ।

pukhraaj said...

dhanywaad sanjay ...