Tuesday, March 30, 2010

लकीरें


काश हाथों में लकीरें न होती ,
यूँ कटी फटी जिन्दगी न होती

कांच की नाजुक दीवारों पे ,
कोई कील चुभी न होती

गिट्टी से खेलती छोटी सी लड़की ,
समय से पहले बड़ी न होती

डोर से कट कर भी पतंग ,
किसी की झोली में गिरी न होती

सीता का अपहरण हुआ न होता ,
धरती भी फटी न होती

16 comments:

सुशीला पुरी said...

देखिये उस पेड़ को ,तनकर खड़ा है आज भी ,
आंधीयों का काम चलना है ,चलीं ,तो क्या हुआ ?

राज भाटिय़ा said...

क्या बात है जी बहुत अलग आंदाज है , धन्यवाद

Shekhar Suman said...

kaash !!!
in saari baaton par hamara bas chalta......
khair bahut achhi rachna......

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

कविता बहुत अच्छी है....नयापन लिये हुए है..
वैसे एक शायर के शेर का भावार्थ है-
तकदीर उनकी भी होती है,
जिनके हाथ नहीं होते.

M VERMA said...

सुन्दर रचना

Udan Tashtari said...

बढ़िया अलग तरह की रचना!!

रश्मि प्रभा... said...

गिट्टी से खेलती छोटी सी लड़की ,

समय से पहले बड़ी न होती
per aisa kahan hota hai......aam gharon me betiyaan saal bhar me badi ho jati hain aur nirantar badi hoti jati hain......
mann ke umra ki koi pahchaan nahin hoti

सागर said...

kuch bimb kamaal ke hain... kavita kuch behad alag chizon ki taraf dhyan dila gayi

अनिल कान्त : said...

achchhi panktiyaan hain

Harish Joshi said...

डोर से कट कर भी पतंग ,
किसी की झोली में गिरी न होती

दिगम्बर नासवा said...

काश ये सब न हुवा होता ....

पर समय किसकी सुनता है ...
बस अपने क़िस्से बुनता है ...

Shekhar Suman said...

meri nayi rachna jaroor dekhein, aapki pratikriya ka intzaar rahega....

अजय कुमार said...

अलहदा अंदाज अच्छा लगा

ज्योति सिंह said...

डोर से कट कर भी पतंग , किसी की झोली में गिरी न होती
सीता का अपहरण हुआ न होता , धरती भी फटी न होती
bahut sundar panktiyaan ,saath me shahid ji ke sher bhi khoob rahe .

kshama said...

Bahut,bahut sundar...alfaaz nahi..

ashish said...

bahut accha andaz