Wednesday, November 4, 2009








सुलग
रहा है दिल उठ रहा है धुआं
दरवाजा खोल दे या आग बुझा दे यारां
मुफलिसी के दोरों से गुजरता चला गया
सोना , पाना अच्छा न था और खोना बुरा यारां
सच्चे दिल की दुआ कुबूल होती है
सजदे में सर झुके या हाथ उठें यारां
चौखट का दिया हूँ रौशनी कर ही जाऊंगा
चाँद लम्हों की मोहलत तो दे मुझे यारां
मुरीद हूँ आसमान का मै भी चाँद की तरह
कि झील में गिरकर भी बुझता नही यारां
सर उठा कर लहरों ने मदद को पुकारा था
किनारे पर आकर दम तोड़ गयीं यारां

26 comments:

Mithilesh dubey said...

बेहद खूबसूरत व दिल से लिखी गयी लाजवाब रचना। बहुत-बहुत बधाई

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

वाह...
रेणु दीपक् जी आपने तो बहुत सुन्दर रचना पेश की है।
बधाई!

M VERMA said...

चौखट का दिया हूँ रौशनी कर ही जाऊंगा
चन्द लम्हों की मोहलत तो दे मुझे यारां
बहुत खूबसूरत एहसास और अभिव्यक्ति
बहुत सुन्दर

Kishore Choudhary said...

चंद लम्हों की मोहलत तो दे मुझे यारां
मुरीद हूँ आसमान का मै भी चाँद की तरह.

क्या बात है ... शाम हसीन हुई !

महेन्द्र मिश्र said...

सजदे में सर झुके या हाथ उठें यारां
चौखट का दिया हूँ रौशनी कर ही जाऊंगा

गजब की अभिव्यक्ति. बढ़िया रचना आभार.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बहुत सुन्दर.

लोकेन्द्र said...

खूब बहुत खूब.......

ओम आर्य said...

दिल से आती हुई सदा जो नश्तर बनकर चुभ भी गया दिल के दरो दीवार पे!

क्रिएटिव मंच said...

चाँद लम्हों की मोहलत तो दे मुझे यारां
मुरीद हूँ आसमान का मै भी चाँद की तरह

waah...waah
kya baat hai
bahut khoob

shubh kamnayen

राज भाटिय़ा said...

खूब बहुत खूब.

अनिल कान्त : said...

aapki likhi rachna mujhe bahut bahut bahut pasand aayi

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है....

apnesapne said...

क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया...
shyad apne sab kuch to kah diya..
beautiful ji....

सागर said...

चंद लम्हों की मोहलत तो दे मुझे यारां
मुरीद हूँ आसमान का मै भी चाँद की तरह


... मैं भी हूँ... इन पंग्तियों का तो क्या मुझे भी दम तोड़ना होगा?

mark rai said...

सच्चे दिल की दुआ कुबूल होती है.....
बहुत खूबसूरत एहसास और अभिव्यक्ति
बधाई!

गौतम राजरिशी said...

"मुरीद हूँ आसमान का मै भी चाँद की तरह
कि झील में गिरकर भी बुझता नही यारां"

ये दो मिस्‍रे हैं या कयामत का आगाज़...?

क्रिएटिव मंच said...

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प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

वाह!सुन्दर प्रस्तुति....बहुत ही अच्छी लगी ये रचना.....

creativekona said...

सर उठा कर लहरों ने मदद को पुकारा था
किनारे पर आकर दम तोड़ गयीं यारां

Renu ji,
Bahut khuubasoorat panktiyan--dil ko chhuune vaalee.
hemant kumar

IRFAN said...

sachhe dil ki dua qubool hoti hai,sajde mein sir jhuke ya dua mein haath uthhe..bahut geri baat hai Renuji.Aplke shaayeri lajawaab hai.
Lagta hai dollower banna padega.
Shubhkaamnaayein.

लोकेन्द्र said...

चौखट का दिया हूँ रौशनी कर ही जाऊंगा
वाह क्या बात कही है आपने....

योगेन्द्र मौदगिल said...

सुलग रहा है दिल उठ रहा है धुआं
दरवाजा खोल दे या आग बुझा दे यारां

jawaab nahi aapki in panktiyon ka..
sadhuwaad...

संजय भास्कर said...

कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

सुलभ सतरंगी said...

मुरीद हूँ आसमान का मै भी चाँद की तरह
कि झील में गिरकर भी बुझता नही यारां
सर उठा कर लहरों ने मदद को पुकारा था
किनारे पर आकर दम तोड़ गयीं यारां


बेमिसाल.
आपके ब्लॉग पर आना सुखद रहा.

ग़ज़ल कुछ कहते हैं हम भी

Hamid Siddharthi said...

nice poem
liked it

sanjeev kuralia said...

dhanyavd renu ji, aapki suksham soch aapke har shabad se jhalkti hai....man ko bahut skoon mila....