
वैसे तो भादों की पूर्णिमा के चाँद की सुन्दरता का ख़ास महत्त्व तो नहीं है फ़िर भी शायद पहली बार इस पूर्णिमा के चाँद को देखकर सुकून सा मिल रहा है ...सांवले आसमान में वो अकेला चाँद और उसके नीचे मैले से बादल की एक रेखा जो उसकी चांदनी से चमक रही है ...मानों किसी कविता की ख़ास पंक्तियों को अंडर लाइन कर दिया हो ....और इस गोल गोल चाँद से कुछ दूर पूरे आसमान में चमकता हुआ इकलौता तारा ....मेरी आंखों को क्यूँ खटक रहा है ...जलन हो रही है मुझे इससे ...ज्वार भाटा सा उठ रहा है ...वो उस चाँद के पास आने को बेताब नज़र आ रहा है ....जिस दिशा में चाँद में चाँद चलता जाता है वो सितारा भी उसके आकर्षण में बंधा साथ साथ चल रहा है ...कुछ कुछ उसे डर है चाँद को खोने का ...आकर्षण में तो मै भी बंध रही हूँ पर साथ साथ नहीं चल सकती हूँ ...और ये लो ...बादल की मैली सी पंक्तियाँ और उभर आयीं हैं और चाँद को अपनी कैद में ले रही हैं ...नहीं तुम ऐसा नहीं कर सकते ...क्या कुसूर है उस बेचारे का ...खोल दो ये हथकडियां ...और बंधन से मुक्त कर दो ...दिन भर की आग में तपे, जले , जाने कितने दिलों को ठंडक दे रहा होगा ...तुम्हे देखकर तो धरती की तृष्णा जाग्रत हो जाती है पर ये जो चाँद है न ...इसकी खुशबू दिलों को महका देती है ....तभी तो ये कितने ही कवियों की कल्पना का आधार बनता रहा है ....
तारों की भीड़ में
अमावास की पीर है जिन्दगी
मेरा चाँद आज फ़िर मुझसे रूठा है ...
ख्वाब सज़ा लेते पलकों पे
जिन्दगी रखती हाथों पे
अगर तुम मेरे साथ होते ...